देह व्यापार अपरिहार्य बुराई है!

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 _भारत में देह व्यापार के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करता आलेख, वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक *श्रीनिवास* की कलम से_ 

आजादी के बाद जो अच्छा हुआ, और जो नहीं हो सका, इस पर बहस चलती रहती है. गलत-सही दावे-प्रतिदावे किये जाते रहे हैं. मगर आज तक किसी ने इस बात पर चिंता जाहिर नहीं की, न ही यह सवाल उठाया कि देश भर में देह व्यापार अब तक क्यों चल रहा है?

हकीकत यह है कि जनप्रिय व समाजवादी रुझान के नेहरू से लेकर ‘राष्ट्रवादी’ वाजपेई और नरेंद्र मोदी तक के प्रधानमंत्री रहते राजधानी दिल्ली में ‘जीबी रोड’ आबाद है!  कलकत्ता का नाम कोलकाता हो गया. तीन दशकों तक वहां वाम मोरचा का शासन रहा, लेकिन ‘सोनागाछी’ अब तक फल-फूल रही है. देश की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में मान्य मुंबई में कमाठीपुरा सहित अनेक इलाकों में ऐसी मंडियां हैं! इसी तरह देश के छोटे  बड़े शहरों में लगभग खुलेआम देह की मंडी लगती है. और इसे  ‘सामान्य’ मान लिया गया है.  इसलिए कि भारत में वेश्यावृति या देह व्यापार पर कानूनी रोक नहीं है.

कानून कहता है कि कोई युवती अपनी स्वेच्छा से पैसे लेकर सेक्स करे तो अपराध नहीं है, लेकिन वही युवती ‘स्वेच्छा’ से ही किसी पुरुष मित्र के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए तो हमारे समाज की नजर में वह अपराध है और ‘पाप’ भी. इसकी सजा के बतौर उसका सामूहिक बलात्कार किया जा सकता है. उसकी सरेआम पिटाई हो सकती है. बाकायदा पंचायत के फैसले से. 

कानूनन संगठित वेश्यालय चलाना अपराध है. वेश्याओं की दलाली करना जुर्म है. मगर देह बेचना जुर्म नहीं है. यानी इसे महिलाओं के लिए एक ‘रोजगार’ मान लिया गया है. यानी बिचौलिया या दलाल रखे बिना कोई महिला यह ‘धंधा’ करे तो हर्ज नहीं, लेकिन जिस किराये के मकान में रह कर वह ऐसा करती है, उस मकान का मालिक धंधे में सहयोग करने का ‘अपराधी’ मान लिया जायेगा!

हम स्त्रियों का बहुत सम्मान करते हैं, हम तो देवी की पूजा करनेवाले देश हैं…. आदि आदि दावों और अब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारों का कोई मतलब है, यदि अनुमानतः एक करोड़ स्त्रियाँ (जिनमें बड़ी संख्या में बच्चियां भी होंगी) जीवन यापन के लिए देह का सौदा करने को विवश हैं? वैसे सच यही है कि भारत में यह ‘परंपरा’ भी नयी नहीं है. हमारे यहाँ तो बाकायदा ‘नगरवधू’ का चयन होता था, जो सामंतों और समर्थों का ‘मनोरंजन’ करती थी. यहाँ तक कि मंदिरों में देवदासी होती थी, जो कहने को मंदिर की साफ-सफाई करती थी, पर असल में वह भी पुजारियों, समाज के प्रभु वर्ग-सामंतों की यौन सेवा के लिए उपलब्ध होती थी. 

फिर अधिकतर राजाओं के अन्तःपुर  और बादशाहों के हरम ऐसी रानियों- उप-पत्नियों और रखैलों से भरे होते थे. इससे उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आती थी. कहीं यही कारण तो नहीं कि हमें स्त्री देह का व्यापार उतना बुरा नहीं लगता.

तो क्या हम इसे अपरिहार्य बुराई मान चुके हैं, जिसे  रोका नहीं जा सकता या जिस पर रोक लगाने की जरूरत भी नहीं है! इस आशय का तर्क तो दिया ही जाता रहा है कि ‘सभ्य’ समाज में शान्ति बनी रहे, इसके लिए ‘कोठे’ जरूरी हैं. सच भी यही है कि कथित सभ्य लोगों की जरूरतों के लिए ही ऐसी बस्तियां बसी हैं और उनके ही दम पर फलफूल रही हैं. 

यदि यह कानूनन जायज है, यानी यह भी एक रोजगार है, तो इस रोजगार में लगी महिलाओं से नफरत क्यों? इस मामले में हमारे पाखंड का आलम और प्रमाण यह है कि हम ‘वेश्या’ से नफरत करते हैं, उसके ‘ग्राहकों’ से नहीं. ‘वेश्या’ किसी औरत के लिए एक गंदी गाली है; जबकि उसका ग्राहक होना बहुतों के लिए उपाधि, शान की बात है. कथित रंडी तो अपना पेट पालने के लिए ऐसा करती है; और वह चाहे भी तो एक बार इस धंधे के जाल में फंस जाने पर उससे निकल नहीं सकती. हिम्मत करके निकल भी जाए तो कोई ‘सभ्य’ पुरुष उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा.

यह सचमुच समाज, सामजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के लिए कोई मुद्दा नहीं है, तो कम से कम हमें स्त्री का सम्मान करने का दावा तो छोड़ ही देना चाहिए.

वास्तविकता यह है कि दलालों, वेश्यालयों के संचालकों और उनको संरक्षण देने वालों के खिलाफ बना कानून उनके संरक्षण की भूमिका निभा रहा है. जहां कहीं भी देह व्यापार हो रहा है – इक्का-दुक्का और छिपे तौर पर जो होता है, उसे छोड़ कर- संगठित तरीके से ही संचालित होता है. यह सालाना करोड़ों नहीं अरबों रुपये का धंधा है, जो अघोषित रूप से स्थानीय पुलिस के संरक्षण में चलता है. अब तो कॉल गर्ल का धंधा, जो निजी उद्यम जैसा प्रतीत होता है, भी एक बड़े नेटवर्क के तहत चलता है. बड़े बड़े सौदे तय करने में उनकी सेवा ली जाती है.  सभी जानते हैं, पर किसी को फर्क नहीं पड़ता. इससे तो बेहतर है कि इसे खुली छूट देकर वैध ही करार दिया जाये. इस पर रोकथाम के लिए बना  क़ानून तो दरअसल पुलिस को वसूली का अघोषित लाइसेंस का काम करता है.

क्या यह विषय चर्चा के काबिल भी है? क्या स्त्री की बराबरी को सिद्धांततः सही मानाने वालों को इसे मुद्दा नहीं बनाना चाहिए? क्या सभी राजनीतिक दलों पर इसके लिए नैतिक दबाव नहीं डाला जाना चाहिए कि वे इस ओर गंभीरता से विचार करें और जरूरी पहल करें?

Srinivas
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Srinivas is a Ranchi (Jharkhand, India) based veteran journalist and activist. He regularly writes on contemporary political and social issues.

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