मणिपुर जल रहा है, कोई सुन रहा है?

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मणिपुर में करीब डेढ़ महीने पहले भड़की हिंसा थमने का नाम नहीं  ले रही है. केंद्र सरकार के हस्तक्षेप; सुरक्षा बलों और सेना की भारी तैनाती के बावजूद रह-रह कर हिंसा भड़क रही है. ताजा घटना में 14 जून को समुदायों के बीच हुई  गोलीबारी में कम से कम 11 लोगों की जान चली गई. मणिपुर जल रहा है, जिसमें वनस्पति या पशु नहीं, मनुष्य ही मनुष्य की आहुति दे रहा है. एक राज्य के निवासी दुश्मनों की तरह एक-दूसरे की जान ले रहे हैं, एक- दूसरे की संपत्ति नष्ट कर रहे हैं, जला रहे हैं! लेकिन शेष भारत को बहुत फर्क नहीं पड़ा है!

शीर्षक की प्रेरणा मणिपुर निवासी सेना के अवकाश प्राप्त ले. जनरल एल निशिकांत सिंह के हाल में छपे उस मार्मिक बयान से मिली, जिसमें उन्होंने कहा है- ‘यहां कोई भी कभी भी किसी की भी जान ले सकता है या किसी की भी संपत्ति को कितना भी नुकसान पहुंचा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे लीबिया, नाइजीरिया और सीरिया जैसी जगहों पर होता है. इस वक्त यहां रहने वालों को ऐसा महसूस हो रहा है, मानो मणिपुर को उबलने के लिए छोड़ दिया गया हो.’  अंत में बाकी देश, खास कर ‘दिल्ली’ को संबोधित उनके इस सवाल में पूरे मणिपुर की पीड़ा झलक रही है- कोई सुन रहा है?

मणिपुर समस्या का सबसे गंभीर और दुखद पहलू यही है कि वह शेष भारत के लिए कोई समस्या नहीं है. कल्पना कीजिये कि यह स्थिति बिहार, झारखंड, राजस्थान या उत्तर प्रदेश आदि भारत की कथित मुख्यभूमि के राज्यों की होती, इतने दिनों से हिंसा और मारकाट मची होती तो मीडिया में किस तरह की चर्चा होती? प्रमुख राजनीतिक दलों का क्या रुख होता? क्या मणिपुर की समस्या राष्ट्रीय समस्या नहीं है, नहीं मानी जानी चाहिए? लेकिन लगता तो नहीं है कि मणिपुर की आग की आंच दिल्ली तक पहुंच रही है. सब कुछ यथावत हो रहा है. शेष भारत अपने ढंग से, मणिपुर से अप्रभावित, चल रहा है.

और यह उस  मणिपुर में हो रहा है, जहां तथाकथित ‘डबल इंजन’ सरकार है. मतलब वहां उसी दल की सरकार है, जो केंद्र की सत्ता में भी है. फर्ज करें कि मणिपुर में किसी और दल की सरकार होती, तो भाजपा और केंद्र का क्या रवैया होता?

हिंसा के तात्कालिक कारणों को जानने से पहले कुछ और भी जान लेना चाहिए- मणिपुर विधानसभा की कुल 60 में से 40 सीटें तराई क्षेत्र, यानी इम्फाल घाटी में हैं, जहां ‘मैतेई’ समुदाय बसा हुआ है. शेष बीस सीटें जनजातीय पहाड़ी इलाकों में हैं. राज्य की कुल 40 लाख आबादी में करीब 55 फीसदी ‘मैतेई’ हैं. नतीजतन राजनीति पर उनका वर्चस्व है. जनजातियां (मुख्यतः कुकी-नगा) लंबे समय से विधानसभा में सीटें बढ़ाने की मांग करती रही हैं. मगर एक पेंच यह भी है कि घाटी का क्षेत्रफल कम है.  करीब दस से पंद्रह  प्रतिशत. वन और खेती पर जनजातियों को बढ़त है. ‘मैतेई’ लोगों को जनजातियों की जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है; या कहें, हाल तक नहीं था. वे लम्बे समय से एसटी दर्जा दिये जाने की मांग करते रहे थे,  ताकि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिले, साथ ही जमीन खरीदने पर लगी पाबंदी भी हट जाये. एक सच यह भी है कि मैतेई समुदाय,  ने करीब तीन सौ साल पहले हिंदू धर्म अपना लिया. पहले ट्राइबल ही था. अब वे भाजपा के समर्थक भी हैं. 

मैतेई समुदाय की आरक्षण की मांग बहुत पुरानी है, राज्य सरकार ने दशकों तक कुछ नहीं किया. हाईकोर्ट ने गत 19 अप्रैल को राज्य सरकार से इस पर अपना स्टैंड स्पष्ट करने कहा. सरकार हरकत में आयी और  गत तीन मई को मैतेई को एसटी का दर्जा दे दिया गया. पहले से ही तुलना में संपन्न, राजनीति में प्रभावी  मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा और आरक्षण की सुविधा दिया जाना जनजातियों को अपने हितों के खिलाफ लगता रहा है और वे इसका विरोध करते रहे हैं. तीन मई को जनजातीय समुदायों के एक संगठन ने उसके विरोध में बंद बुलाया. मौजूदा तनाव, टकराव और हिंसा का एक कारण तो यही माना जा रहा है. 

हिंसा की शुरुआत

राज्य सरकार ने ‘गवर्नमेंट लैंड  सर्विस’ नामक कानून बना कर फरवरी माह में सरकार ने पहाड़ों पर बसे आदिवासियों (मुख्यतः कुकी) को खदेड़ने का अभियान शुरू कर दिया था. आदिवासियों को अवैध घुसपैठिया घोषित कर दिया गया, जबकि कुकी आदि का दावा है कि जंगलों को अधिसूचित किये जाने के बहुत पहले से वे वहां रह रहे हैं, अतः जंगलों और साथ की जमीन पर उनका स्वाभाविक अधिकार है. कुकी बहुल इलाके में इस अभियान और मैतेई को एसटी का दर्जा दिये जाने का विरोध हो ही रहा था. तीन मई को चूराचांदपुर जिला मुख्यालय में, मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह जहां एक समारोह में शामिल होने वाले थे, बम विस्फोट हुआ. सभास्थल पर तोड़फोड़ हुई और कार्यक्रम रद्द कर देना पड़ा. तीन मई को ही ‘इंडिजिनस ट्राइब लीडर्स फोरम’ ने चूराचांदपुर में बंद का आह्वान किया था. उस दौरान भारी उपद्रव हुआ और पूरे मणिपुर में हिंसा फैल गयी.

मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है, तो  सीमा से ड्रग्स और हथियर आसानी से आते रहे हैं. उग्रवादी भी आराम से आते-जाते रहे हैं. कुकी जनजाति दोनों तरफ बसी है. 

मणिपुर की हिंसा में मिशनरियों की भूमिका के आरोप भी लगते रहे हैं. इसमें कितनी सच्चाई है, यह खोज का विषय है. लेकिन ईसाई संगठनों का आरोप है कि कुछ महीनों से जारी उपद्रव में करीब तीन सौ चर्चों पर हमला हुआ, उनमें तोड़फोड़ हुई, आग लगा दी गयी.

कुकी स्टूडेंट्स ओर्गनाइजेशन (चूराचांदपुर जिला) के जेनरल सेक्रेटरी डीजे हओकिप ने एक न्यूज एजेंसी  से बात करते हुए कहा कि पहाड़ी-वन  क्षेत्र  के अनेक इलाकों को रिजर्व घोषित कर दिया गया और सैकड़ों कुकी परिवारों के वहां से हटा दिया गया. लेकिन इससे भी अधिक नाराजगी इस बात से है कि ऐसे बेदखल किये गए लोगों के पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की गयी.

अलग-अलग रिपोर्ट्स हैं. अलग-अलग एंगल्स है. सोशल मीडिया पर ढेरों वीडियो हैं.  इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. पर यह तो सच है ही कि मणिपुर में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. देश का एक राज्य करीब डेढ़ महीने से जल रहा है. इस हिंसा को शांत करने, आपसी विवाद को हल करने में वहां की भाजपा सरकार बुरी तरह विफल रही है. और ऐसा नहीं लगता कि केंद्र भी इस मामले में अपेक्षित गंभीरता और तत्परता दिखा रहा है. 

मणिपुर की  मौजूदा स्थिति से यह भी पता चलता है कि सिर्फ संख्या की दृष्टि से, सिर्फ बहुमत के आधार पर अगर आप कोई बात अल्पमत पर, कम आबादी पर  थोपना चाहेंगे तो उसका क्या नतीजा हो सकता है. एक बहुभाषी, बहुधर्मी, बहुनस्लीय देश या राज्य में किसी तरह बहुमत जुटा कर कोई सोचे कि हम कोई भी फैसला कर और लागू कर सकते हैं, तो उसका कैसा नतीजा हो सकता है, वह भी मणिपुर में दिख रहा है.

हम शेष भारत के लोगों  के लिए मणिपुर; बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों के सारे लोग एक जैसे हैं. मगर वह पूरा क्षेत्र बंटा हुआ है- अनेक स्तरों पर.  एक दूसरे के हितों का टकराव है,  दुश्मनी भी. लेकिन ‘दिल्ली’ उत्तर-पूर्व को अपने ढंग  चलाने का प्रयास करती रही है. पहले की सरकारें यही करती रही है; और ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ ने भी वही किया.

पूर्वोत्तर में प्रभावी क्षेत्रीय दल अपनी पहचान बनाये रखते हुए केंद्र से बेहतर संबंध बनाये रखना चाहते हैं. इसी कारण जो दल दिल्ली पर काबिज रहता है, उसे पूर्वोत्तर राज्यों में थोड़ी सहूलियत रहती है. पहले यह सहूलियत कांग्रेस को हासिल  थी, अब भाजपा को है. लेकिन लगता है, भाजपा भी पूर्वोत्तर की जटिल सामजिक संरचना को ठीक से नहीं समझ सकी. 

‘दिल्ली’ उनको अपने हिसाब से चलाना चाहती है. बाकी जगहों पर तो चल जाता है लेकिन मणिपुर में  नहीं चला या नहीं चल सकता है. जहां के जीवन को आप समझे बिना वहां की विविधता को समझे बिना वहां की  जनजातियों के आपसी इंटरेस्ट और आपसी झगड़ों को समझे बिना आप सिर्फ चुनाव जीतने, सरकार बना लेने को बड़ी उपलब्धि मान लेंगे, तो उसका दूरगामी नतीजा नुकसानदेह भी हो सकता है. मणिपुर में भी यही हुआ.

हालत यह है कि सरकार पर से लोगों का भरोसा उठ गया है.  गांव-गांव में लोग बचाव के लिए हथियारों के साथ पहरा दे रहे हैं. एक दूसरे पर हमला कर रहे हैं. हजारों लोग शिविरों में हैं. हजारों पलायन कर पड़ोसी राज्यों में शरण लिये हुए हैं. फिलहाल इस स्थिति के सहज होने की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही; देश अपने ढंग से चल रहा है!

Srinivas
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Srinivas is a Ranchi (Jharkhand, India) based veteran journalist and activist. He regularly writes on contemporary political and social issues.

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