आंदोलन की दिशा: संयम आवश्यक

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अभी सोशल मीडिया के कुछ चैनलों पर कथित गोदी पत्रकारों और भाजपा नेताओं पर हमले या उनके साथ बदसलूकी के दृश्य दिखे हैं. यह बेहद चिंताजनक है. भीड़ का यह व्यवहार निंदनीय है. मगर इसे महज भीड़ की गुंडागर्दी मानने से बचें.

इन अति उत्साही युवाओं से निवेदन कि वे संयम बरतें, चंद लोगों की ऐसी हरकतों से न सिर्फ पूरे आंदोलन की छवि खराब होगी, बल्कि इसी बहाने सरकार को दमन का एक बहाना मिल जायेगा. हासिल कुछ नहीं होगा!

इसी प्रसंग में भाजपाई मित्रों, जो 1974 के आंदोलन में साथ थे, से विनम्र निवेदन-

मुझे याद है, 1967 में बिहार में काँग्रेस इतनी बदनाम और अलोकप्रिय हो गयी थी कि उसके नेता ‘कांग्रेसी टोपी’ पहन कर निकलने से बचते थे! लप्पड़- थप्पड़ का खतरा था! फिर 1974 में ऐसा ही हुआ! आज वह बचकानी हरकत लगती है, मगर हम किसी कुत्ते या गधे के गले में कांग्रेस के किसी सांसद या विधायक के नाम लिखा पट्टा लटका कर सड़क पर दौड़ा देते थे! पब्लिक भी मजा लेती थी!

अभी एक के बाद एक राज्य जीत कर आपकी पार्टी आत्मविश्वास से भरी हुई है. इस कारण गुमान में भी है. एक चमत्कारी युगपुरुष का नेतृत्व भी हासिल है. मगर बात बिगड़ते देर नहीं लगती. इंदिरा गांधी भी 1971 में लोकप्रियता के शिखर पर थीं. पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत कर उनको ‘लौह महिला’ मान लिया गया! मगर दो तीन साल के अंदर सब बिखरने लगा. अंततः ’77 में सत्ता से बाहर हो गयीं!

ऐसा आपके साथ नहीं होगा, इस मुगालते में मत रहिए.

हालांकि एक संदेह यह भी है कि कहीं आंदोलन को बदनाम करने, यह उसे अराजक और हिंसक साबित करने के लिए तो इस तरह के हमले नहीं हो रहे हैं. नहीं तो आंदोलन के नेतृत्व को तत्काल इसे रोकने का काम करना चाहिए.

मगर भाजपा और ‘गोदी’ चैनलों/ पत्रकारों को इस पर कुछ बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है. बीते वर्षों में कथित गो-रक्षा और धर्म की रक्षा के नाम पर प्रशासन के संरक्षण में जो गुंडागर्दी होती रही है; और जिस तरह कुछ चैनल उसे जायज ठहराते रहे हैं, वह भूल गये. अब थोड़ा बहुत वही आपके साथ होने लगा तो रोने लगे! पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद जो हो रहा है, वह भी देश देख रहा है. टीएमसी के नेताओं, सांसद तक पर सरेआम हमला ‘जनता का गुस्सा’ नहीं है, योजना के तहत हो रहा है.

आज दिल्ली सहित अनेक स्थानों पर जो हो रहा है, वह वांगचुक या ‘तिलचट्टों’ के कारण नहीं, मूलतः कुव्यवस्था और सरकार के अहंकारी अंदाज के कारण हो रहा है. युवाओं का असंतोष गुस्से में बदल रहा है. कल तक जो डरे हुए थे, वे भय मुक्त हो रहे हैं. ऐसे में लाठी-गोली से बात बनेगी नहीं, और बिगड़ेगी. अभी भी देर नहीं हुई है, भाजपा के नेताओं कार्यकर्ताओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए! आलोचना सुनने-सहने की आदत डालनी चाहिए! विरोधी को अपना और हिंदू धर्म-समाज का दुशमन कहने से बाज आना चाहिए! मोदी सभी हिंदुओं के इकलौते प्रतिनिधि नहीं हैं, भाजपा का मतलब देश और हिंदू समाज नहीं है!

बाकी आपकी मर्जी. आपका ‘ईश्वर’ आपको सद्बुद्धि दे!

Srinivas
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Srinivas is a Ranchi (Jharkhand, India) based veteran journalist and activist. He regularly writes on contemporary political and social issues.

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